Sunday, March 8, 2020

SIGNIFICANCE OF COMMUNITY HEALTHCARE FOR INDIA

                                   -MILAN K. SINHA, Health Motivator & Stress Management Consultant 

It is disturbing to find that a large population of the country is suffering either from one or more communicable or non-communicable diseases. Data, in fact suggest that non-communicable diseases are fast taking greater number of people into its grip. The ever growing number of patients of Cancer, CVD, Diabetes, Liver and Kidney ailment vindicates this point.

We all know that the cost involved in disease prevention is far less than that of curative treatment. Putting more emphasis on prevention also suits our country in the light of huge population, scarcity of fund and existing poor medical facilities in most of the state-run hospitals besides huge shortage of doctors, nurses and paramedical staff.  The cost of modern medical treatment is also unreasonably high and so quite unaffordable for many, notwithstanding Central Government’s initiative under Aayushman Bharat Yojana for disadvantaged section of society. As such, the only way to protect the common people from falling sick frequently and to keep them healthy is to strengthen, improve and speed-up community healthcare initiatives.

In today’s world of Liberalization, Privatization and Globalization Community Healthcare is of great significance as it is focused on health promotion and disease prevention of the community. It is also a major field of study within the medical and clinical sciences which focuses on the maintenance, protection and improvement of the health status of community members and different population groups in the society.

Simply speaking, community healthcare refers to meeting the needs of defined group of people or a community by identifying their health related problems and managing the well-being of community members. Those individuals, who make up a community, live in a somewhat localized area. To say, keeping in view the health status of the people living in a particular village or town and initiate suitable actions to protect and improve their health is normally termed as community healthcare.
The success of community healthcare programmes relies upon the transfer of information from health professionals to common masses using one-to-one or one to many communication. Undoubtedly, the role of ASHA (Accredited Social Health Activist) and ANM (Auxiliary Nursing Midwife) who function as community health workers is extremely vital in this regard. Making Primary Health Centres (PHCs) now renamed as Wellness Centres fully functional 24x7 with necessary infrastructure is equally important. 

It is all knowing that drinking water and sanitation are two very critical determinants of health, which can ensure reduction of more than 60% cases of communicable diseases in particular. As such, making available the facility of water supply and sanitation in both rural and urban areas alike is a prerequisite for successful implementation of community healthcare schemes. 

Undeniably, it is the responsibility of policy makers and community leaders to plan health strategies that enhance the health at different geographical areas having equal opportunities of healthcare facilities and matching services to all members. As health is a state subject, the ministry of health and family welfare needs to form stronger partnerships with other stakeholders involved in this task and impress upon them to work in a concerted manner within a time frame for better and sustainable results at the ground level. It is noteworthy that few states including Kerala have been performing well in this area by adopting a holistic and consistent approach. 

As rightly said, ‘Awareness is half the solution’ and ‘Prevention is better than cure’, it is very important to focus significantly on aspects of Health Awareness and Motivation through all routes including schools, colleges, community centres etc. for speedier and more cost-effective outcomes. Needless to emphasise that proactive measures by all community healthcare personnel would definitely go a long way in keeping the common people, more particularly children, ladies and old persons disease free to a great extent.
(hellomilansinha@gmail.com)

       Will meet again with Open Mind. All The Best.

Friday, February 28, 2020

मन को मना लो

                                              -मिलन सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर ...

कॉलेज के दिनों की बात है. हमारे एक प्राध्यापक थे. बहुत अच्छा पढ़ाते थे. पढ़ाते वक्त उनकी तल्लीनता के क्या कहने. क्लास में या बाहर कई विद्यार्थियों को अक्सर उन्हें यह कहते सुना था  कि सफल होना है तो मन को मना लो और अच्छे काम में लगा लो. उनके कहने का अभिप्राय यह था कि पढ़ना, खेलना, खाना या अन्य कोई भी काम हो - बस मन लगा कर करो.  सामान्यतः कुछ इसी  तरह की नसीहत बचपन से लेकर बड़े होने तक, घर-स्कूल-कॉलेज-यूनिवर्सिटी तक और उसके बाद भी बड़े-बुजुर्ग-अध्यापक अपने बच्चों-विद्यार्थियों को देते रहते हैं. आपको भी मिली होगी. लेकिन क्या आपने कभी गंभीरता से इस नसीहत पर विचार किया है ?

सभी जानते हैं कि मानव मन चंचल है और मन की चंचलता के मामले में बच्चे-किशोर-युवा स्वभावतः आगे रहते हैं. कभी सिर्फ दो मिनट अपनी आखें बंद कर मन को खुला छोड़ दें और इस बात पर ध्यान दें कि आपका मन कहां-कहां घूम रहा है, क्या-क्या सोच रहा है? ऐसे, बैठे-बिठाए भी मन के विचरण का अंदाजा लगाना आसान है.  ज्ञानीजन भी कहते हैं कि अगर किसी ने अपने मन को मना लिया तथा  मन को अच्छे काम में लगा लिया तो  वे जीवन की तमाम चुनौतियों का अच्छी तरह सामना करते हैं; उनके लिए जीवन के मुश्किल-से-मुश्किल दौर से निकलकर  लक्ष्य तक पहुंचना कठिन नहीं होता है. खासकर विद्यार्थियों के लिए ऐसा करना तो बहुत फायदेमंद है.

 फर्ज कीजिए कि आप किताब खोलकर पढ़ने बैठे हैं, पढ़ भी रहे हैं, पर कुछ देर बाद एकाएक लगता है कि जैसे कुछ पढ़ा ही नहीं या कुछ पढ़ा तो कुछ  वाकई  नहीं पढ़ा. ऐसा भी कई बार  देखा होगा कि क्लास में शिक्षक पूरा चैप्टर पढ़ा गए और अंत में जब उन्होंने एक छोटा-सा प्रश्न पूछा तो कुछ विद्यार्थी उत्तर नहीं दे सके, जब कि अन्य कई छात्र-छात्राओं ने उस सवाल का जवाब आसानी से दे दिया. आखिर ऐसा  क्यों और कैसे होता है? दरअसल, तन से तो सब विद्यार्थी  वहां मौजूद थे और शिक्षक महोदय द्वारा पढ़ाये जाने वाले विषय के प्रति सजग भी दिख रहे थे अथवा खुद भी जब पढ़ रहे थे, दोनों ही स्थिति में क्या आपका  मन भी तब वहां था या  कहीं और भटक रहा था या किसी सोच में व्यस्त था? शर्तिया उस वक्त तन और मन एक साथ उस कार्यविशेष के प्रति समर्पित नहीं था. पढ़ने, काम करने आदि की बात छोड़ें, बहुत लोग तो क्या खा रहे हैं, कितना खा रहे हैं - कुछ देर बाद ही उसकी बाबत पूछने पर बताने में असमर्थ रहते हैं. सोचनेवाली बात है कि पढ़ाई हो या अन्य कोई काम, शरीर से तो वैसे भी वे वहां होते ही हैं, समय, उर्जा आदि भी खर्च करते हैं, लेकिन चूंकि मन को उस काम में नहीं लगा पाते, इसके कारण वे अपेक्षित लाभ नहीं पाते हैं. इसका नकारात्मक असर उनके व्यक्तित्व विकास पर पड़ना लाजिमी है. मन को मनाने और अच्छे काम में लगाने से यह परेशानी नहीं होती है. 

दिलचस्प बात है कि जब आप किसी काम को मन से करते हैं तो न केवल उसमें अपेक्षित रूचि लेते हैं और तन्मयता से उसे अंजाम देने की भरसक कोशिश करते हैं, बल्कि  उस काम को संपन्न  करने का पूरा आनंद भी महसूस करते हैं. इसके विपरीत जब आप उसी काम को बेमन से करते हैं, बोझ समझकर करते हैं तो उस कार्य की गुणवत्ता तो दुष्प्रभावित  होती ही है, कार्य पूरा होने के बाद भी आनंद की अनुभूति नहीं होती है. 

कहने का तात्पर्य यह कि अगर पढ़ने बैठे हैं तो मन को सिर्फ पढ़ने में लगाएं. उस एक-दो घंटे के सीटिंग में मोबाइल को साइलेंट मोड में करके दूर रख दें, ध्वनि प्रदूषण सहित अन्य व्यवधानों से बचें और हर तीस मिनट के बाद एक मिनट का ब्रेक लें और आंख बंद कर यह याद करने की कोशिश करें कि इस बीच क्या पढ़ा, क्या उसे अभी आप लिख पायेंगे? लगातार ऐसा अभ्यास करते रहने पर आप खुद ही मन लगाकर पढ़ने में पारंगत होते जायेंगे. अन्य किसी काम में भी आप इस सिद्धांत को अमल में लाकर लगातार अपने परफॉरमेंस को बेहतर करने में सक्षम हो सकते हैं. ऐसे, हमारे संत-महात्मा ध्यान के नियमित अभ्यास से मन को मनाने और नियंत्रित करने का उपदेश तो देते ही रहे हैं. 

सच तो यह है कि मन लगा कर काम करनेवाले विद्यार्थी अच्छे-बुरे हर  परिस्थिति में  अपने काम को एन्जॉय भी करते हैं. लिहाजा वे ज्यादा स्वस्थ एवं खुश भी रहते हैं. काबिलेगौर बात यह भी है कि इस तरह काम करने से कार्यक्षमता बढ़ती है, आत्मविश्वास में इजाफा होता है, समय का पूरा सदुपयोग होता है और साथ ही आप बेहतर परिणाम के हकदार भी बनते हैं.   (hellomilansinha@gmail.com)

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# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" में प्रकाशित 

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Friday, February 14, 2020

गुड हेल्थ के लिए जरुरी है साल्ट स्मार्ट होना

                            - मिलन  सिन्हा,   हेल्थ मोटिवेटर  एवं  स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट 
आपने भी शायद वह कहानी पढ़ी होगी  जिसमें राजा की छोटी बेटी अपने पिता को नमक जैसा महत्वपूर्ण बताती है. नमक का हक़ अदा करने के सन्दर्भ में नमक हराम, नमक हलाल जैसे जुमले तो हम सब बचपन से सुनते आये हैं. नमक के एकाधिक विज्ञापनों में कई नामचीन लोगों को देश का नमक खाने और उसका हक़ अदा करने का वादा करते भी देखा-सुना है.

सच कहें तो खाने में नमक न हो तो भोजन बेस्वाद लगता है. तभी तो  नमक को सबरस कहा जाता है, सभी रसों के केन्द्र में रखा जाता है. कहने का अभिप्राय यह कि नमक हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. रसायन शास्त्र में नमक को  सोडियम क्लोराइड के नाम से जाना जाता है. सच पूछिए तो सोडियम क्लोराइड में 40 प्रतिशत सोडियम होता है और 60 प्रतिशत क्लोरीन. सोडियम हमारे शरीर के लिए एक जरुरी तत्व है. यह मनुष्य के शरीर में पानी का सही स्तर बनाए रखने से लेकर ऑक्सीजन और दूसरे पोषक तत्वों को शरीर के सभी अंगों तक पहुंचाने के काम में सहायता करता है. हमारे तंत्रिकाओं को सक्रिय बनाए रखने में भी यह अहम भूमिका अदा करता है. 

हमारे देश में आम आदमी आमतौर पर रिफाइंड नमक अर्थात आयोडाइज्ड नमक का इस्तेमाल करते हैं. दरअसल समुद्री नमक को रिफाइंड करने के क्रम में उसे कृत्रिम रूप से आयोडीन युक्त किया जाता है. इस आयोडाइज्ड नमक को घेंघा या गोइटर रोग से बचाव के लिए उपयोग करने की सलाह दी जाती है. ऐसे दूध, केला, सब्जी, अंडा आदि कई आम खाद्द्य पदार्थों के सेवन से भी हमें आयोडीन की पूर्ति होती है और वह भी प्राकृतिक रूप से. ज्ञातव्य है कि एक व्यस्क आदमी को प्रतिदिन एक सुई के नोंक के बराबर आयोडीन (150 mcg) की जरुरत होती है. 

दिलचस्प तथ्य है कि  सोडियम प्राकृतिक रूप से अनाज, सब्जियों, दूध, फल आदि चीजों में अलग-अलग मात्रा में मौजूद होता है. सोडियम युक्त चीजों में मूली, गाजर, मीठा आलू, ब्रोकली, पपीता, प्याज, टमाटर आदि शामिल हैं. कहने का मतलब, जो लोग मोटे तौर पर संतुलित आहार लेते हैं, उन्हें कई वैकल्पिक स्रोतों से भी सोडियम की आपूर्ति हो जाती है. साथ में उन्हें आयोडीन भी प्राकृतिक रूप में मिल जाता है. अतः उन्हें आयोडाइज्ड नमक लेने की खास जरुरत नहीं होती. आजकल ऐसे लोगों को सेंधा नमक इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है, क्यों कि आयोडीन की अधिकता भी हमारे शरीर के लिए नुकसानदेह हैं. रोचक बात यह भी है कि सेंधा नमक में अनेक मिनरल्स प्राकृतिक रूप से मौजूद होते हैं जो हमारे सेहत के लिए बहुत लाभकारी हैं. 

देखा जाए तो आजकल हमलोग नमक और नमकवाली चीजें कुछ अधिक ही खा रहे हैं.  हम अपने मुख्य भोजन में दाल, साग-सब्जी, मांस-मछली-अंडा, आचार, पापड़ आदि का खूब सेवन करते हैं, जिसमें नमक का जमकर प्रयोग होता है. नतीजतन, हमारे शरीर में नमक की मात्रा  यानी सोडियम की मात्रा मानक स्तर से कहीं ज्यादा बढ़ जाती है और इससे हमलोग अनायास ही ह्रदय रोग, हाइपरटेंशन, दमा, ओेस्टोपोरोसिस, किडनी स्टोन जैसी कई  घातक बीमारी की चपेट में आ जाते हैं.

हम सब यह भी जानते हैं कि नमक का व्यापक प्रयोग खाने की चीजों में स्वाद के अलावे परिरक्षक (प्रिज़र्वेटीव) के रूप में भी किया जाता रहा है. मक्खन, आचार, भुजिया, गाठिया, चिप्स, कुरकुरे जैसे अनेक डब्बाबंद एवं पैकेट में मिलनेवाली नमकीन चीजों में नमक यानी सोडियम  की मात्रा अपेक्षाकृत ज्यादा होने का यह भी एक कारण है. काबिलेगौर बात है कि यही अधिक सोडियम युक्त चीजें रोगों को बढ़ानेवाला साबित हो रहा है. 

दिलचस्प तथ्य है कि कई बार डॉक्टर आदि के कहने पर हम नमक तो खाना कम कर देते हैं लेकिन डिब्बाबंद पेय सहित कुछ अन्य चीजों का ज्यादा सेवन करने लगते हैं. जानने योग्य बात है कि इन सबमें बेकिंग सोडा या  प्रिज़र्वेटीव का उपयोग होता है जिसमें सोडियम मौजूद होता है.

पाया गया है कि एक औसत भारतीय वयस्क के दैनिक आहार में 8 ग्राम से ज्यादा नमक होता है अर्थात 3 ग्राम से ज्यादा सोडियम जब कि बेहतर स्वास्थ्य के लिए करीब 4 ग्राम नमक काफी है अर्थात करीब 1.5 ग्राम सोडियम. बताते चलें कि एक रिपोर्ट के मुताबिक़ ब्रिटेन में एक जागरूकता अभियान के परिणाम स्वरुप वर्ष 2003 से 2011 के बीच नमक के इस्तेमाल में 15 फीसदी की कमी आई. इसका सीधा एवं सकारात्मक असर स्ट्रोक तथा  ह्रदय रोग के मामले में 40% तक की  कमी के रूप में सामने आया. जापान, फ़िनलैंड, अमेरिका सहित अन्य कई देशों ने भी समय-समय पर जागरूकता अभियान के जरिए लोगों को इस दिशा में प्रेरित करने का काम किया है और इससे इन देशों में ह्रदय रोग सहित अन्य कई रोगों के मरीजों की संख्या में कमी आई है.

ऐसा भी पाया गया है कि नमक या नमकीन चीजों का ज्यादा सेवन करनेवाले लोग अपेक्षाकृत जल्दी मधुमेह के शिकार होते हैं, क्यों कि ऐसे लोगों को नमकीन चीजें खाने के बाद मीठा खाने की प्रबल इच्छा होती है और सामान्यतः वे लोग जरुरत से ज्यादा मिठाई और मीठे पेय पदार्थ - पेप्सी, थम्स अप, कोकाकोला, स्प्राइट, माजा आदि का सेवन करते हैं.

सार-संक्षेप यह कि नमक या सोडियम हमारे शरीर के लिए जरुरी है, लेकिन इसका अत्यधिक सेवन सेहत के लिए बहुत हानिकारक है. अतः इसके सेवन में बुद्ध का मध्यम मार्ग अपनाना सबसे अच्छा माना गया है. हां, अंत में एक गौरतलब बात और. हर व्यक्ति को अपनी शारीरिक स्थिति एवं जरुरत के साथ-साथ मौसम को ध्यान में रख कर नमक का उपयोग करना चाहिए.   
(hellomilansinha@gmail.com)


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# दैनिक भास्कर में प्रकाशित
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Friday, January 31, 2020

संयम को अपना दोस्त बनाएं

                                                            - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
संयम का मीठा फल हर क्षेत्र में मिलता है. विलियम शेक्सपियर कहते हैं, "वे कितने निर्धन हैं जिनके पास संयम नहीं है." सही बात है. घर-बाहर हर जगह हमें इसका प्रमाण मिलता है. 

क्या आपने वर्ल्ड कप क्रिकेट में लीग स्टेज के नौवें मैच में  श्रीलंका के खिलाफ खेलते हुए भारत के रोहित शर्मा की शानदार शतकीय पारी देखी? जरुर देखी होगी. रोहित ने जिस संयम से इस पारी में दर्शनीय शॉट लगाए, उसकी विश्वभर में चर्चा हो रही है और प्रशंसा भी. इसी मैच में के.एल. राहुल ने भी सलामी बल्लेबाज के रूप में पूरे संयम के साथ खेलते हुए 111 रन बनाए और  रोहित के साथ मिलकर वर्ल्ड कप के इतिहास में सलामी जोड़ी द्वारा शतक लगाने का अभूतपूर्व  रिकॉर्ड बनाया. ऐसे इस टूर्नामेंट में कई अन्य टीमों के कुछ और खिलाड़ियों ने संयमशीलता का प्रमाण प्रस्तुत करते हुए अपने-अपने टीम के लिए बहुत उल्लेखनीय योगदान किया. जरा सोचिए, अगर इन खिलाड़ियों ने उन मैचों में उतावलापन दिखाया होता, जल्दबाजी की होती तो ऐसी यादगार पारी वे खेल पाते? 

'हड़बड़ से गड़बड़', 'जल्दी काम शैतान का' जैसी कहावतें सभी विद्यार्थी सुनते रहते हैं. बड़े-बुजुर्ग हमेशा कहते हैं कि संयम का फल मीठा होता है. पेड़ पर लगे फल को समय पूर्व अर्थात पकने से पहले तोड़ कर खाने पर वह खट्टा व कसैला लगता है. जो लोग संयम रखते हैं और फल को पकने देते हैं, उन्हें ही मीठा फल खाने को मिलता है. विद्यार्थियों के मामले में भी हमें ऐसा ही  देखने को मिलता है. 

विद्यार्थी जीवन में अमूमन हर कोई  उत्साह, उमंग और उर्जा से भरा रहता है. वह कई तरह के सपने देखता है. उसकी विविध इच्छाएं-आकांक्षाएं होती हैं. वह एक साथ बहुत कुछ हासिल करना चाहता है और वह भी फटाफट. इसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहता है. वाकई करने की कोशिश भी करता है. हां, यह बात और है कि कई बार चाहकर भी कर नहीं पाता है. इसके एकाधिक कारण हो सकते हैं. लेकिन इस सबमें एक बात तो साफ़ है कि चाहने, करने, होने और फल पाने के बीच संकल्प और मेहनत के साथ-साथ संयम की बहुत अहम भूमिका होती है. सोच कर देखिए, अगर कोई किसान यह सोचे कि आज बीज रोपा और कल फसल काट लेंगे, तो क्या यह संभव होगा? उसी तरह अगर कोई विद्यार्थी यह सोचे कि उसकी आज की पढ़ाई या अध्ययन  का फल  कल ही या उनके इच्छानुसार तुरत मिल जाएगा तो यह क्या सही होगा? इस संबंध में प्रकृति के व्यवहार और चरित्र को समझना दिलचस्प तथा ज्ञानवर्धक होगा.

दरअसल, जीवन में संयम का पालन करना कामयाबी की कुंजी है. असंख्य गुणीजनों ने जीवन  में संयम की अनिवार्यता एवं अहमियत को अपने कर्मों से साबित किया है और रेखांकित भी. लिहाजा, विद्यार्थियों के लिए संयम के महत्व को ठीक से समझना और उसे अपने जीवन में अंगीकार करना बहुत ही जरुरी है. सभी  इस बात को मानेंगे कि जोश के साथ होश में रहकर हर कार्य को ठीक से सम्पन्न करने में संयम की अहम भूमिका होती है. संयम से विद्यार्थियों में धीरता, गंभीरता, समझदारी एवं परिपक्वता आती है. इससे  सही निर्णय लेने में वे ज्यादा सक्षम होते जाते है. इसका बहुआयामी फायदा उनके साथ-साथ समाज और देश को भी मिलता है. ऐसे विद्यार्थी पढ़ाई में बेहतर तो होते ही हैं, अन्य कार्यों में भी बेहतर प्रदर्शन करते हैं. इसके विपरीत जो विद्यार्थी जीवन में संयम का महत्व जानते-समझते हुए भी उसे उपयोग में नहीं लाते हैं, उनके जीवन में अनायास ही अनुशासनहीनता, संवेदनहीनता, उदंडता जैसी बुराइयां घर कर लेती हैं, जिसका दुष्परिणाम उनको और देश-समाज को बराबर भुगतना पड़ता है. 

शोध कार्य में लगे विद्वानों-वैज्ञानिकों को जरा गौर से काम करते हुए देखिए तो आपको पाता चलेगा कि संयम का दामन थामकर वे साल-दर-साल तन्मयता से परिश्रम करते रहते हैं, तब कहीं जाकर वे अपने शोध कार्य को पूरा कर पाते हैं. दुनिया में हुए तमाम आविष्कारों का इतिहास अगर हम पढ़ें तो संयम  की महत्ता का प्रमाण स्वतः मिल जाएगा. इलेक्ट्रिक बल्ब के आविष्कारक थॉमस अल्वा एडिसन इसके ज्वलंत उदाहरण हैं. सार्वजनिक जीवन में असाधारण सफलता हासिल करनेवालों के जीवन पर भी नजर डालें, चाहे वे महात्मा गांधी, सुभाष चन्द्र बोस, लालबहादुर शास्त्री, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण, लोहिया, दीनदयाल उपाध्याय या अब्दुल कलाम हों, तो आपको वाणी से लेकर उनके व्यवहार एवं कार्यशैली में यह  गुण अनायास ही दिख जायेंगे. सच है, उन लोगों ने संयम को हमेशा अपना दोस्त बनाए रखा. 
                                                                          (hellomilansinha@gmail.com)


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Friday, December 20, 2019

अच्छी प्लानिंग से पाएं सफलता

                                                                      - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
चाहे-अनचाहे आजकल सभी विद्यार्थीयों को कई बार एक साथ कई काम करने होते हैं. इन कार्यों या प्रोजेक्ट्स को  नियत समय सीमा के अन्दर अंजाम तक पहुंचाने की सामान्य अपेक्षा भी होती  है.  ऐसे भी अवसर आते हैं जब वे सारे कार्य इतने महत्वपूर्ण होते हैं और लगते भी हैं कि किसे पहले एवं किसे थोड़ी देर बाद में करें, फैसला करना मुश्किल हो जाता है. सच कहें तो मल्टी-टास्किंग के मौजूदा दौर में कई काम एक साथ करने का प्रेशर तो रहता है, लेकिन कई बार  एक साथ सब काम करना संभव नहीं होता. और -तो -और, ऐसी परिस्थिति में अगर सारे काम एक साथ करने की ठान भी लें, तथापि  सभी काम को सही तरीके से अंजाम तक पहुंचाना कई बार काफी जोखिमभरा भी साबित होता है. 

बहरहाल, सुबह उठने से लेकर रात में सोने से पहले तक सभी विद्यार्थी किसी-न-किसी काम में व्यस्त रहते हैं. पढ़ाई, परीक्षा, प्रतियोगिता और परिणाम के प्रेशर  के बीच  कई  विद्यार्थी सुबह पहले जो भी सरल एवं आसान काम सामने होता है उसे निबटाने में लग जाते हैं. लिहाजा, आवश्यक या महत्वपूर्ण या कठिन और मुश्किल काम या तो बिल्कुल नहीं हो पाता है या शुरू तो होता है, लेकिन एकाधिक कारणों से पूरा  नहीं हो पाता है. इस वजह से अहम काम या तो छूट जाते हैं या अधूरे रह जाते हैं. वे काम अगले दिन के एजेंडा में आ तो जाते हैं, लेकिन आदतन अगले दिन भी ऐसा ही कुछ होता है. इस तरह पढ़ाई हो या अन्य कार्य, छोटे, सरल और गैर-जरुरी काम तो किसी तरह होते रहते हैं, किन्तु महत्वपूर्ण और आवश्यक  कार्यों का अम्बार खड़ा होता रहता है. और तब उन्हें उतने सारे अहम कार्यों को तय सीमा में पूरा करना मुश्किल ही नहीं, असंभव लगने लगता है. इसका बहुआयामी दुष्प्रभाव उनके परफॉरमेंस पर पड़ना लाजिमी है. ऐसी स्थिति में आत्मविश्वास डोलने लगता है; बहानेबाजी और शार्ट-कट का सिलसिला चल पड़ता है. ऐसे में धीरे-धीरे उन्हें अपने  ज्ञान, कौशल एवं क़ाबलियत  पर अविश्वास-सा होने लगता है. उन्हें कठिन कार्यों  से डर और घबराहट होने लगती है. नतीजतन, ऐसे विद्यार्थी खुद को औसत या उससे भी कम क्षमतावान मानने लगते हैं और लोगों की नजर में भी वैसा ही दिखने लगते हैं.

इसके विपरीत कुछ विद्यार्थी सुबह पहले आवश्यक, महत्वपूर्ण और कठिन काम को यथाशक्ति   अंजाम तक पहुँचाने में लग जाते हैं. वे सभी काम पूरा हो जाने पर उन्हें  संतोष और खुशी दोनों मिलती है. अंदर से एक फील-गुड फीलिंग उत्पन्न होती है जिससे वे  अतिरिक्त उत्साह और उमंग से भर जाते हैं. आत्मविश्वास में इजाफा तो होता ही है. अब वे  बहुत आसानी और तीव्रता से आसान कार्यों को कर लेते हैं. शायद ही उनका कोई जरुरी काम छूटता है. अगले दिन काम करने की उनकी यही शैली होती है. वे चुनौतियों से घबराते  नहीं, बल्कि उनके स्वागत के लिए पूरी तरह तैयार रहते हैं. उनके लिए हर दिन एक नया दिन होता है और हर बड़ी-छोटी चुनौती से सफलतापूर्वक निबटना उनका मकसद.

कहना न होगा, आज के तेज रफ़्तार कार्य संस्कृति में जब कई बार सबकुछ फटाफट एवं अच्छी तरह करना होता है, तब प्राथमिकता तय करके कार्य करना अनिवार्य होता है. यहां  एलन लेकीन की इस बात पर गौर करना फायदेमंद होगा कि अपनी प्राथमिकताओं की समीक्षा करें और यह सवाल पूछें – हमारे समय का इस वक्त सबसे अच्छा उपयोग क्या है. 

दरअसल, लगातार अच्छी सफलता अर्जित करनेवाले सभी विद्यार्थी प्राथमिकता तय  करके काम करने को कामयाबी तक पहुंचने का एक महत्वपूर्ण सूत्र मानते हैं. लिहाजा, अगर अगले कुछेक घंटे में कई विषयों को पढ़ने  की चुनौती सामने होती है, तो उसमें से पहले कौन-सा पढ़ें और बाद में कौन-सा, अपनी समझदारी से 'प्राथमिकता के सिद्धांत' को लागू करते हुए वे विषयों को अति महत्वपूर्ण, महत्वपूर्ण और कम महत्वपूर्ण  की श्रेणी में रखकर न केवल सभी विषयों को यथासमय निबटाते हैं, बल्कि आगे उसके  परिणाम में बेहतरी भी सुनिश्चित कर पाते हैं. ऐसे विद्यार्थी आवश्यकता के अनुसार प्राथमिकता में थोड़ा -बहुत परिवर्तन के लिए मानसिक रूप  से पूरी तरह तैयार भी रहते हैं. 

बताने की जरुरत नहीं कि स्कूल, कॉलेज या यूनिवर्सिटी के अत्यंत सफल, सफल और कम सफल विद्यार्थियों के बीच एक बड़ा फर्क इस बात का भी होता है. 
 (hellomilansinha@gmail.com)


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Friday, November 22, 2019

बेहतर स्वास्थ्य के लिए पानी पीने की कला में पारंगत होना बेहतर

                                - मिलन  सिन्हा,  हेल्थ मोटिवेटर  एवं  स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट 
हमारी पृथ्वी पर करीब 70% जल है, फिर भी विश्वभर में जल समस्या पर चर्चा आम है, चाहे वह प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता की बात हो, जल जनित बीमारियों से हर साल देश में मरनेवालों की बात या जल को लेकर राज्यों के बीच विवाद. हमारे स्वास्थ्य को सन्दर्भ में रख कर बात करें तब  भी हम सबने सुना है, सोचा है और कभी-न-कभी कहा भी है  कि जल ही जीवन है, जल नहीं तो कल नहीं और बिन पानी सब सून. यह बिलकुल सही है.

रोचक तथ्य है कि एक व्यस्क व्यक्ति के शरीर में करीब 60% जल है, बच्चों में यह प्रतिशत कुछ ज्यादा तो बुजुर्गों में थोड़ा कम होता है. यूँ कहें तो हम सभी चलते फिरते पानी के बोतल है. शरीर में पानी की कमी हो जाए तो हमारा शारीरिक संतुलन बिगड़ने लगता है, कई तरह की स्वास्थ्य समस्या पैदा होने लगती है और कई बार तो पानी चढ़ाने तक की नौबत आ जाती है . तो चलिए, मानव स्वास्थ्य से जल के अदभुत रिश्ते की थोड़ी विवेचना करते हैं. 

विभिन्न अवसरों पर अपने हेल्थ मोटिवेशन सेशन में अलग–अलग तबके एवं उम्र के लोगों से मुलाक़ात तथा चर्चा के क्रम में यह बात स्पष्ट रूप से सामने आई कि अधिकांश लोग पानी पीने की कला  में पारंगत नहीं हैं.  कहने का अभिप्राय यह कि ज्यादातर लोगों को नहीं मालूम कि  पानी कैसे पीना चाहिए, कितना पीना चाहिए, कब पीना या कब नहीं पीना चाहिए. 

दरअसल अधिकांश लोग पानी पीते नहीं, गटकते हैं जैसे कि उन्हें पानी पीने तक की फुर्सत नहीं है. यह भी बताते चलें कि खड़े-खड़े बोतल से मुंह में पानी उड़ेलना और उसे फटाफट गटकना स्वास्थ्य की दृष्टि से सही नहीं है.  पीने का अर्थ है धीरे -धीरे जल ग्रहण करना और वह भी बैठ कर आराम से. सच पूछें तो स्वास्थ्य की दृष्टि से गिलास में मुंह लगाकर आराम से चाय या कॉफ़ी के तरह सिप करते हुए पानी पीना और यह महसूस करना कि इससे हमारा शरीर जलयुक्त हो रहा है या हमारा शरीर रूपी अदभुत पेड़ अच्छी तरह सींचित हो रहा है,  सबसे अच्छा माना गया है. कहते हैं इस तरह पानी पीनेवाले अम्लता और मोटापे से भी बचे रह सकते हैं. 

रोज सुबह नींद से उठने के तुरत बाद कम से कम आधा लीटर गुनगुना पानी पीना हमारे सेहत के लिए बहुत लाभकारी होता है. अगर इसे और प्रभावी बनाना है तो गुनगुने पानी में आधा नींबू निचोड़ लें. अगर आप ह्रदय रोग के मरीज नहीं हैं तो आप उस नींबूयुक्त पानी में थोड़ा सेंधा नमक मिला लें, लाभ ज्यादा मिलेगा. कुछ लोग जो मधुमेह से पीड़ित नहीं हैं, वे नींबू के साथ एक चम्मच शहद मिलाकर पीते हैं. इस तरह से अगर हम सुबह पानी का सेवन करते हैं तो इसका इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने एवं शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने  के अलावे  एकाधिक फायदे हैं. बताते चलें कि सामान्य तापमान से बहुत ज्यादा ठंडा या गर्म पानी हमारे शरीर के लिए अच्छा नहीं होता है. 

विशेषज्ञ यह भी कहते हैं  कि खाने के तुरत पहले, खाना खाने के बीच में और खाने के तुरत बाद पानी नहीं पीना चाहिए, क्यों कि इससे पाचन क्रिया दुष्प्रभावित होती  है. ऐसे, कभी किसी विषम परिस्थिति में दो-चार घूंट पानी पीना असामान्य बात नहीं है. हां, स्वास्थ्य विशेषज्ञ खाना खाने के कम-से-कम 40  मिनट पहले और खाना खाने के 40 मिनट बाद पानी पीने की सलाह देते हैं.  

सभी विशेषज्ञ बताते हैं कि शरीर जितना हाइड्रेटेड रहेगा, हम उतना ही स्वस्थ रहेंगे.  ज्ञातव्य है कि दिनभर में हमारे शरीर से कई तरीके से पानी निकलता रहता है. लिहाजा शरीर में पानी का अपेक्षित स्तर बनाए रखना अनिवार्य है. खासकर रात में सोने से पूर्व पानी अवश्य पीना चाहिए, इससे हार्ट व ब्रेन स्ट्रोक की संभावना कम हो जाती है. तनाव प्रबंधन में पानी की अच्छी भूमिका होती है. कभी मानसिक तनाव हो तो एक गिलास पानी घूंट-दर-घूंट पीकर इसका सुखद अनुभव कर सकते हैं. 

कहने का सीधा अर्थ यह कि सही मात्रा, सही समय और सही तरीके से पानी पीने से हम कब्ज, पिम्पल्स, मोटापा, मधुमेह, किडनी स्टोन, चर्म रोग, आर्थराइटिस, कोलाइटिस, हाई ब्लड प्रेशर, गैस की समस्या, नाक और गले की समस्या, माइग्रेन आदि शारीरिक समस्याओं से बचे रह सकते हैं. सार-संक्षेप यह कि दूसरों को 'पानी पिलाने' के मुहावरे को चरितार्थ करने के बजाय  खुद पानी पीने की कला में पारंगत होना हर दृष्टि से बेहतर स्वास्थ्य की बड़ी गारंटी है.

अंत में एक अहम बात. अगर कोई व्यक्ति किसी रोग विशेष से पीड़ित हैं  और डाक्टरी इलाज में हैं तो डॉक्टर की सलाह के मुताबिक़ ही पानी पीएं.    
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Sunday, October 20, 2019

निराशा व अवसाद को कहें बाय-बाय

                                             - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर...
हाल ही में एक रिपोर्ट में यह बताया गया कि हमारे स्कूल-कॉलेज के अनेक  विद्यार्थियों में पढ़ाई  के प्रेशर, घरवालों की उनसे परीक्षा में अच्छे परिणाम की अपेक्षा और खुद उनका अपने रिजल्ट के प्रति आशंकित रहना निराशा और अवसाद का कारण बनता है.  कई मामलों में यह भी पाया गया है कि कुछ  विद्यार्थी  येन-केन-प्रकारेण अच्छा ग्रेड या अंक पाने और दूसरे से ज्यादा कामयाब होने के दौड़ और होड़ में जाने-अनजाने शामिल हो जाते हैं. ऐसे में, अपेक्षित परिणाम न आने पर उनका कन्फयूजन बढ़ना और परेशान हो जाना स्वाभाविक है. गौर करनेवाली  बात है कि वे इस विषय पर जितना सोचते हैं, उतना ही उलझते चले जाते हैं. वे अपनी स्थिति को अभिभावकों से साझा करने से भी कतराते हैं. परिणाम स्वरुप कई बार स्थिति चिंताजनक हो जाती है. 

यह सच है कि फ़ास्ट लाइफ और टफ कम्पटीशन के मौजूदा दौर में आम तौर पर निराशा का भाव देश के अनेक छात्र-छात्राओं  के मन–मानस को उलझाए रखता है.  कई विद्यार्थी तो अनिश्चितता और आशंका से ज्यादा कुशंका से जूझते रहते हैं. इससे उनकी सेहत तो खराब होती ही है, वे घर-बाहर कहीं भी चैन व सुकून से कार्य निष्पादित नहीं कर पाते, जिसका स्पष्ट असर उनकी उत्पादकता पर पड़ता है. आरोप लगना शुरू हो जाता है, तंज कसे जाते हैं, कभी-कभार डांट भी पड़ती है. मन और बैचैन हो जाता है. निराशा का भाव और गहराता है. कठिनाई समस्या बनने लगती है. अवसाद के आगोश में जाने की यह प्रारंभिक अवस्था होती है. लिहाजा इससे बचना निहायत जरुरी है. और इसके लिए उम्मीद का दामन थामना श्रेयष्कर साबित होता है. मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने क्या खूब कहा है कि हमें सीमित निराशा को स्वीकार तो करना चाहिए, परन्तु अनंत उम्मीदों का साथ नहीं छोड़ना चाहिए. 

मेरे एक मित्र हैं. निराशा के पल में वे बचपन में पढ़ी प्रख्यात कवि मैथिलीशरण गुप्त की यह कविता एक बार गुनगुना लेते हैं. कहते हैं, इससे उन्हें प्रेरणा मिलती है, उनमें आशा का संचार होता है. कविता की पंक्ति है : नर हो न निराश करो मन को, कुछ काम करो, कुछ काम करो, जग में रहकर कुछ नाम करो ... ....

मनोवैज्ञानिक मानते और कहते हैं कि स्वस्थ एवं प्रसन्न रहने के लिए जीवन में उम्मीद का साथ होना आवश्यक है. हमारे देश के अनेकानेक ऋषि –मुनि तो इस विषय पर अपने अमूल्य विचारों एवं व्याख्यानों के माध्यम से असंख्य लोगों को विंदास जीने को प्रेरित करते रहे हैं. 

विचारणीय प्रश्न यह भी है कि तमाम कोशिशों के बावजूद अगर आप किसी कारण असफल हो भी जाते हैं तो आपके सिर पर आसमान टूट कर तो गिरनेवाला नहीं. अलबत्ता कुछ नुकसान होगा. हां, विश्लेषण करने पर कई बार आप पाते हैं कि आपके प्रयास में कमियां रह गई थी. ऐसे समय सबसे बेहतर होता है, जल्दी-से-जल्दी उसे मन से स्वीकार करना और अपनी कोशिशों में अपेक्षित सुधार लाना. एप्पल कंपनी के संस्थापक स्टीव जाब्स इस बात पर अमल करने में विश्वास करते थे. 

एक बात और. जीवन से बड़ा कुछ भी नहीं. फिर जीवन में आगे और भी मंजिलें तय करनी बाकी है. जरा सोचिए अमेरिका के सोलहवें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के जीवन यात्रा के विषय में. एक-के-बाद-एक विफलताओं के बाद भी उम्मीद और सत्प्रयासों के बलबूते वे अमेरिका के सर्वोच्च पद पर आसीन हुए और अमेरिका के गृह युद्ध (अमेरिकन सिविल वार) के कठिनतम  समय में देश का सफल नेतृत्व किया, देश में शान्ति स्थापित की. अमेरिका की पहली बधिर एवं नेत्रहीन कला स्नातक एवं प्रख्यात लेखिका हेलेन केलर हो या विश्वप्रसिद्ध ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी स्टीफन विलियम हाकिंग या उनके जैसे अन्य अनेक दिव्यांग विभूति, सबने आशा को हमेशा अपना अभिन्न मित्र बना कर रखा और जीवन में अभूतपूर्व सफलता पाई. यहां यह जानना दिलचस्प तथा प्रेरणादायी है कि एक बार जब किसी ने स्वामी विवेकानन्द से पूछा कि 'सब कुछ खोने से ज्यादा बुरा क्या है' तो स्वामीजी ने उत्तर दिया कि 'उस समय उस उम्मीद को खो देना, जिसके भरोसे पर हम सब कुछ वापस पा सकते हैं.'  सच कहें तो  अपने आसपास देखने पर भी आपको कई लोग मिल जायेंगे जो इस जीवन दर्शन पर अमल करके अपने-अपने कार्यक्षेत्र में उन्नति के नये-नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं.       (hellomilansinha@gmail.com)


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